अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में 10 पैसे की गिरावट आई है।


व्यापार 11 September 2026
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अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में 10 पैसे की गिरावट आई है।

विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 10 पैसे की गिरावट के साथ 95 रुपये 55 पैसे प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ। रुपये में आई इस कमजोरी का असर घरेलू मुद्रा बाजार में देखने को मिला। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर अमेरिकी मुद्रा की मजबूती, विदेशी पूंजी के प्रवाह में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में आर्थिक परिस्थितियों को लेकर बनी अनिश्चितता रुपये पर दबाव डालने वाले प्रमुख कारणों में शामिल रहे। कारोबार के दौरान रुपया एक सीमित दायरे में रहा, लेकिन सत्र के अंत में यह पिछले बंद भाव की तुलना में कमजोर होकर 95.55 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ने पर सामान्यतः भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ता है। इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव भी रुपये की दिशा को प्रभावित करता है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो देश के आयात बिल में वृद्धि हो सकती है और डॉलर की मांग बढ़ सकती है। इससे रुपये में और कमजोरी आने की संभावना रहती है। दूसरी ओर, विदेशी निवेशकों की ओर से भारतीय शेयर बाजार में पूंजी का प्रवाह रुपये को सहारा दे सकता है।

रुपये की विनिमय दर में होने वाला बदलाव आम लोगों और कारोबारियों के लिए भी महत्वपूर्ण है। डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से विदेश से आयात होने वाली वस्तुओं और कच्चे माल की लागत बढ़ सकती है। इसका प्रभाव पेट्रोलियम उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक सामान, औद्योगिक उपकरणों और कुछ अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। वहीं, निर्यातकों के लिए कमजोर रुपया कुछ हद तक लाभकारी हो सकता है, क्योंकि उन्हें विदेशी मुद्रा में प्राप्त होने वाली आय को रुपये में बदलने पर अधिक राशि मिल सकती है।

बाजार में निवेशकों की नजर अब वैश्विक आर्थिक संकेतकों, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेश के रुझान पर बनी हुई है। इन कारकों में होने वाले बदलाव से आने वाले दिनों में रुपये की चाल प्रभावित हो सकती है। फिलहाल 95.55 रुपये प्रति डॉलर पर रुपये का बंद होना भारतीय मुद्रा बाजार में जारी दबाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं को दर्शाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, निकट भविष्य में रुपये की स्थिरता के लिए विदेशी पूंजी प्रवाह, मजबूत घरेलू आर्थिक संकेतक और वैश्विक बाजारों में स्थिरता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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